लोहिया की सोशलिस्ट धारा के सादगीपसंद एवं लोकप्रिय व्यक्तित्व-जनेश्वर

मणेन्द्र मिश्रा मशाल

आज जनेश्वर मिश्रा का जन्मदिन है. उनका सबसे बड़ा परिचय यह था कि वे भारत की जाति व्यवस्था में तथाकथित उच्च जाति में पैदा होकर भी जकड़न भरे जातीय दंभ से दूर रहते हुए विचार एवं कर्म से समाज के निचले तबके को सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में सम्मान दिलाने के लिए आजीवन समर्पित रहे. 90 के दौर में मंडल-कमंडल के बाद हुए ध्रुवीकरण में जनेश्वर पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े रहते हुए सामाजिक न्याय और सम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए हाशिये पर चले गए सोशलिस्ट धारा को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी धारा के सभी प्रमुख लोगों को जोड़ते हुए समाजवादी पार्टी की स्थापना का कार्य किया. जिससे उस दौर में तेजी से फैल रहे जातीय वैमनस्यता और धार्मिक कट्टरता के असर को कम करने में बड़ी मदद मिली. वंचितों के प्रति अपनी इसी सोच की वजह से वे अपने नाम के आगे लगने वाले जातीय पहचान से स्वयं को आजीवन दूर रखे.

जनेश्वर को लोहिया की परंपरा को व्यवहारिक जीवन में जीने की वजह से छोटे लोहिया के नाम से ख्याति मिली. लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण पहचान सोशलिस्ट धारा में लोहिया के बाद लोकबन्धु राजनारायण के सानिध्य में रहते हुए समाजवाद को नयी ऊंचाईयां प्रदान करने में सहयोगी भूमिका निभाने वाले समाजवादी योद्धा के रूप रही.

बलिया की माटी में जन्में और इलाहाबादी परंपरा में रचे बसे जनेश्वर को कभी भी कोई लोभ छू भी नही पाया. पचास साल से भी अधिक के सशक्त राजनीति में केंद्र से लेकर कई राज्यों के समाजवादी सरकारों में पूरी दखल रखने की हैसियत होने के बाद भी निजी संपत्ति और भष्टाचार से दूर और बेदाग बने रहने की खूबी ने उन्हें सामान्य और विशिष्ट लोगो के बीच अपार सम्मानीय एवं श्रद्धेय बना दिया. पारिवारिक आग्रहों से दूर रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने सम्पर्क में रहते हुए किसी भी परिचित व्यक्ति के गलत कार्यो में कोई भी मदद नही की बल्कि उसे कानून के दायरे में लाने में जरूर कड़ाई से पालन किया. राग-द्वेष से दूर रहते हुए वे सदैव रिक्शा वाले, ठेले वाले, असंगठित मजदूरों, कूड़ा बीनने वाले लड़कों, विधवाओं, उपेक्षितों की मदद और जरूरी सहयोग करने में तत्पर रहते थे. जनेश्वर जी ने कभी भी अपने संपर्कों और संबंधों का बेजा इस्तेमाल नही किया.

देश की शक्ति के चुम्बकीय केंद्र लुटियन्स जोन में लगभग पांच दशकों तक रहते हुए जनेश्वर जी पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ सड़क से संसद तक हल्ला बोलते रहे. जिसकी वजह से कारपोरेट घराने हमेशा उनसे खौफजदा रहते थे. इतना ही नही दिल्ली की राजधानी के सबसे वीआईपी क्षेत्र में जहां आम आदमी या गरीबों को घुसने में भी असहज हो जाना पड़ता था वहीं जनेश्वर जी का राजेन्द्र प्रसाद मार्ग स्थित लोहिया के लोग के नाम से विख्यात आवास गरीबों/मजलूमों के लिए किसी मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारे/चर्च से कम नही था. जहां आम आदमी पूरी ठसक और हिम्मत के साथ अपनी बात रख सकता था. साथ ही उसे पूरा भरोसा भी रहता था कि उसकी फरियाद पर तत्काल सुनवाई भी होगी.

पांच अगस्त के दिन दिल्ली में उनके आवास पर पूरे देश के लोगों का जमावड़ा होता था जहां न केवल वैचारिक गोष्ठी होती थी बल्कि कवि सम्मेलन सहित हास्य विनोद का उत्सवपूर्ण माहौल होता था. सभी पार्टियों के बड़े सियासतदां वहां आम लोगों के बीच बड़े होने का अभिमान ही भूल जाते थे. इलाहाबाद सहित यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश के बहुतेरे लोगों का उनके जन्मदिन के बहाने दिल्ली आने के क्रम में जनेश्वर जी न केवल ठहरने और खाने का प्रबंध करते थे बल्कि उन लोगों को अगले कई दिनों तक दिल्ली घुमाते भी थे.

जनता के साथ उनका गजब का जुड़ाव था. एक बार जो उनके सम्पर्क में आया उन्ही का होकर रह गया. उनके फक्कड़पन जीवन शैली का ऐसा असर रहता था कि जो अपने काम के सिलसिले में मिलने आता वह उनकी सोहबत में रहते हुए असल काम ही भूल जाता था और जाते समय इसका अफसोस भी नही करता कि काम ही नही हुआ. सभी चिंताओं से मुक्त वो जब तक जिये अपने जीवन दर्शन से ही गैर बराबरी मिटाने का रास्ता दिखाते रहे. साथ ही लोहिया की नीतियों पर चलते हुए समाजवादी व्यवस्था के समता और सम्पन्नता आधारित समाज बनाने की दिशा में सरकार और पार्टी को प्रेरित करते रहे.

आज की राजनीति में जब देश को एक ही रंग-ढंग में रंगने के लिए शासन-प्रशासन की शक्तियों का बखूबी दुरुपयोग किया जा रहा है. आतंकवाद से देश की सीमाएं असुरक्षित हैं और धार्मिक कट्टरता से आंतरिक अशांति एवं भीड़तंत्र की अराजकता हावी हो रही है, ऐसे में जनेश्वर के संसदीय राजनीति में उपस्थिति की स्मृतियां जीवंत हो रही हैं. संसद में उनके धारदार बहस के असल मायने लोकतंत्र में राजशाही के स्थान पर लोकशाही की सर्वोच्चता हमेशा बनाये रखने की थी. उनके द्वारा उठाये गए मुद्दे सरकारों के लिए एक नजीर थे कि कैसे जन हितैषी नीतियों के माध्यम से जनता का लोकतंत्र में भरोसा कायम रखा जा सके.

छोटे लोहिया जनेश्वर राजनीति में युवाओं को आगे बढ़ाने में विशेष रुचि दर्शाते थे. उनका मानना था कि समाज की कुरीतियों और विषमताओं के खिलाफ नौजवान ही मजबूत लड़ाई लड़ते हुए जोखिम उठा सकता है. इसीलिए उन्होंने भोपाल अधिवेशन में समाजवादी पार्टी में नया नेतृत्व लाने की मजबूत वकालत करते हुए पार्टी फोरम में प्रस्ताव पारित करवाते हुए अखिलेश यादव को समाजवादी राजनीति में भविष्य के नेता के तौर पर आगे बढ़ाया. इतना ही नही अखिलेश यादव को यूथ फ्रंटल की जिम्मेदारी दिलवाने के साथ उन्हें जमीनी संघर्ष करने की दिशा काम करते हुए संसदीय राजनीति में स्थापित करने में भरपूर सहयोग दिया. पिछले दशक में नेता जी मुलायम सिंह यादव की सरकार बनाने में अखिलेश यादव के नेतृत्व में पूरे प्रदेश में रथयात्रा को उन्होंने ही आगे बढ़वाया. राष्ट्रीय राजनीति सहित यूपी की राजनीति में जन नेता के तौर पर समाजवादी पार्टी के अंदर और बाहर युवा नेतृत्व को पहचान दिलाने में जनेश्वर जी का श्रमसाध्य प्रयास सदैव याद किया जाएगा.

उनके न रहने पर समाजवादी सरकार द्वारा एशिया के सबसे बड़े जैव विविधता युक्त पार्क की स्थापना सहित उनके आदमकद मूर्ति की स्थापना के साथ कालीदास मार्ग पर उनके नाम पर जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट से एक केंद्र स्थापित किया जाना उनके सार्वजनिक जीवन के महत्व की याद दिलाता रहेगा.

जनेश्वर को याद करते हुए सार्वजनिक जीवन में आम जन को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने की लड़ाई लड़ते हुए बेदाग और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने की सीख लेना ही छोटे लोहिया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

 

मणेन्द्र मिश्रा मशाल

लेखक व समाजवादी चिंतक

संस्थापकसमाजवादी अध्ययन केंद्र, 

Email: mishra.marinder@gmail.com

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