अंत में खेल से हार गये उसेन बोल्ट

उसेन बोल्ट एक जीवित किविदंती का नाम है. ओलंपिक खेलों में आठ बार स्वर्ण पदक जीतने वाले बोल्ट को अगर रेसिंग ट्रैक का ‘प्रथम पुरुष’ कहा जाये तो कुछ गलत नहीं होगा. लगभग डेढ़ दशकों तक कैरिबियाई राष्ट्र जमैका और बोल्ट एक दूसरे के पर्याय बने रहे. बोल्ट की रेस सिर्फ रेस भर नहीं थी, उनके दौड़ने के अंदाज में जमैका के समाज की विडंबनायें और खुद उनकी बेहद साधारण प्रष्ठभूमि झांकती हुयी सी लगती थी. वे अपने स्वच्छंद अंदाज से इन विडंबनाओं पर मरहम भी लगाते थे और कुछ पल के लिये अपने चाहने वालों को राहत भी देते थे. हालांकि लन्दन वर्ल्ड चैंपियनशिप की अपनी आख़िरी रेस में बोल्ट तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन ये कहना ठीक होगा कि अंत में वह किसी खिलाड़ी से नहीं, बल्कि ‘खेल’ से हारे. इस रूप में स्वयं खेल उनसे अनुग्रहित हुआ.  

हम इस महान धावक को याद करते हुये उनकी आत्मकथा ‘फास्टर देन लाइटिंग’ का संपादित और अनुदित अंश दे रहे हैं. इसमें बोल्ट ने साल 2002 में जमैका में हुयी वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप में भाग लेने से लेकर जीतने तक के पलों का बेहद भावुक वर्णन किया है.  

मुझे पता था कि मेरा सबसे कठिन इम्तिहान साल के आख़िरी में होने वाली वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप थी. दुनिया भर में कॉलेज स्तर के बच्चों के लिये इस प्रतिस्पर्धा को ‘ओलंपिक’ समझा जाता था. अपने लिये कुछ कर गुजरने का यह पहला बड़ा मौका था. मैं शारीरिक रूप से बाकी सब की तुलना में ज्यादा मजबूत था. लगभग साढ़े छह फुट का होने के नाते मैंने लंबाई के मामले में भी सभी को पीछे छोड़ दिया था.

दो सौ और चार सौ मीटर की दौड़ में कोई भी ऐसा नहीं था जो मेरे लंबे-लंबे क़दमों की बराबरी कर सकता. किस्मत भी मेरे साथ थी क्योंकि ये प्रतिस्पर्धा  पूर्वी यूरोप के बरसात में डूबे रहने वाले किसी शहर में नहीं, बल्कि मेरे घरेलू मैदान किंग्स्टन में ही थी.  मुझे न तो यहां लंबा सफ़र करना था और न ही गैस के बुलबुले छोड़ने वाला पानी पीना था.  वहीं, इस बात का एक दूसरा पहलू भी था. मेजबान और होनहार खिलाड़ी होने के चलते मुझ पर जीतने का भारी दबाव था. प्रशसंक मुझे घरेलू मैदान पर जीत की उम्मीद से निहार रहे थे.

जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा नजदीक आयी, मुझे 200 मीटर की दौड़ में गोल्ड का सबसे मजबूत दावेदार कहा जाने लगा. मैं ज़िन्दगी में पहली बार दबाव और तनाव महसूस कर रहा था. मुझे अंदाजा था कि मेरे नाम को लेकर थोड़ा शोरो-गुल मचेगा. मैं अपने स्कूल में 21 सेकंड में दौड़ पूरी कर रहा था. मेरी उम्र के एक बच्चे के लिये ये बड़ी बात थी. लेकिन प्रतिस्पर्धा नजदीक आने तक मैंने अपने आप को और बेहतर बना लिया. मुझे लगने लगा, कुछ खास होने वाला है. लेकिन एकाएक मैं इस खुशनुमा ख़्वाब से जागा जब मेरे कोच मैक्नेल ने मुझे उस साल के सर्वश्रेष्ठ 20 धावकों के बारे में बताया. मैं यह जानकार गहरे अफ़सोस से भर गया कि उन बीस नामों में मैं छठे स्थान पर था.

मैंने अपने आपको कोसा. बहुत कोसा. अपना प्रदर्शन बेहतर करने की बात मन ही मन दोहरायी, लेकिन खुद पर मेरा संदेह बढ़ता चला गया. मैंने सोचा मैं इस प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लूंगा. किसी बाहरी जमीन पर हार जाना तो एक बात है लेकिन खुद को घरेलू मैदान पर रुसवा कर लेना तो किसी भी तरह से ठीक नहीं. मैं सोचने लगा. मेरे आत्मविश्वास में पहली बार सुराख हुआ था. शायद इसलिये क्योंकि इससे पहले मेरे ऊपर कभी उम्मीदों का बोझ नहीं था. मेरे कोच ने इस बीच मुझ पर काम करना जारी रखा. उसने मुझसे सप्ताह के आख़िरी में होने वाले हर ट्रेनिंग कैम्प में आने को कहा. इसमें कुछ गलत नहीं था, लेकिन मुझे तब के एक-एक पल से नफरत हो रही थी.

अपने घर पर मेरी हर रात अजीब सी बेचैनी में बीत रही थी. मैं धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा की चर्चाओं से उकताने लगा. एक रात अपनी मां से इसी उकताहट में नाराज होकर मैं अपने घर के बरामदे में बैठ गया. जैसे मैंने पूरी दुनिया को पीछे छोड़ दिया और यहां बैठकर आराम करने लगा. बाहर खामोशी थी. मेरी नज़रें घास-फूस, गन्ने के खेतों और जेली के पेड़ों को लांघकर दूर कॉकपिट पर फैले पहाड़ों तक जा रही थी. मेरा भारी मन कुछ शांत हो रहा था. तभी मैंने महसूस किया कि मेरी दादी और मां मेरे पास बैठी हुयी हैं. दोनों मुझसे वर्ल्ड जूनियर्स के बारे में बात करना चाहती थीं, लेकिन मैं इसके लिये तैयार नहीं था. मां ने एक सहज  आत्मीयता से मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा कि अगर मैं हार भी गया तो उन्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी. मैं अपलक उसके चेहरे की झुर्रियों और दरारों को देखता रहा. मेरा गला भर आया, भीतर भावनाओं का सागर उमड़ रहा था. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैंने मां की आंखों में बरसों से सहेजी हुयी आशा और उम्मीद को देखा था. ये वक्त रोने का नहीं, अपने आंसू पोछ लेने का था.

मैंने अगले दिन जाकर मैक्नेल को बताया कि मैंने अपना मन बदल लिया है. उसके पास भी मुझे सुनाने के लिये अच्छी खबर थी. जिन बीस सर्वश्रेष्ठ धावकों के चलते मैं खुद को औसत मान रहा था, उनमें से बहुतों की उम्र 20 वर्ष से ज्यादा हो चुकी थी. वे इस वर्ष प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं ले सकते थे.

मैं एक बार फिर उत्साह और ऊर्जा से लबरेज हो गया. मैंने अपनी ट्रेनिंग में पूरी जान लगा दी, हालांकि आम तौर पर मैं इसके प्रति बहुत लापरवाह रहता था. मुझे अब भी अपने वतन के उन लोगों की चिंता थी जो मेरे मुरीद थे और मुझे जीतते हुये देखना चाहते थे. मैं उन्हें मायूस नहीं कर सकता था. न जाने कितनी रातों में इस ख़याल ने मेरी नींद को तोड़ा. लेकिन इन सब बातों के लिये मुझसे कोई शिकायत नहीं कर सकता था. आखिर मैं पंद्रह बरस की ही तो था. जब मैं अपनी क्वालीफाइंग रेस के लिये नेशनल स्टेडियम में उतरा तो कानों को चीर देने वाला शोर महसूस किया. ऐसे माहौल का सामना मैंने पहले कभी नहीं किया था. इस माहौल में अपनी भावनाओं को काबू करते हुये मैं फाइनल तक पहुंच गया. किंग्स्टन में फाइनल की वो शाम बहुत भारी थी. लू के थपेड़े चल रहे थे, लेकिन मैं शांत था. मैं अपनी मां के शब्दों को याद करते हुये खुद को तसल्ली दे रहा था.

अपने मैच से थोड़ी देर पहले मैं माहौल का जायजा लेने के लिये स्टेडियम गया. वहां जमैका की 200 मीटर की सबसे तेज धाविका ऐनिशा मैकलाफलिन अपनी दौड़ शुरू करने वाली थी. तब मुझे पता नहीं था कि मैंने शायद बहुत बड़ी गलती कर दी है. आगे जैसे-जैसे मैंने अपने कदम बढ़ाये लोगों को उत्साह में चीखते और जमैका के झंडे लहराते हुये देखा. ऐनिशा अपनी दौड़ शुरू कर चुकी थी. मैं अपने कदम तेजी से बढ़ाने लगा. ट्रैक के किनारे पहुंचकर मैंने महसूस किया कि मैं वहां अकेला था. मैं समझ नहीं पाया कि मेरे साथ क्या हुआ. अचानक मैंने स्टेडियम के एक कोने से आ रही तेज आवाजों को सुना. ये चढ़ती-उतरती आवाजें स्टेडियम में चारों तरफ जैसे विचरण कर रही थी. लोग उत्साह में मुझे ‘लाइटिंग बोल्ट’ कहकर पुकार रहे थे. ये शोर मेरे कानों में पड़ा और मुझे पता लगा कि अपने वतन की ओर से मैं 200 मीटर रेस में भाग लेने एक मात्र खिलाड़ी हूं.

जब मैं रेस ट्रैक पर गया तो मेरी टांगे कांप रही थीं. सांसें सीने को चीर देना चाहती थीं. दिमाग पूरी तरह सुन्न पड़ गया था. मैंने बाकी धावकों को वार्म अप करते देखा, लेकिन मैं..मेरी नज़रें तो अपने देश के लोगों की तरफ थीं. मैंने अपनी हिम्मत बटोरी, लेकिन उस समय अपने जूते के फीते बांधना भी एक दुरुह काम था. मैंने अपना दाहिना पांव जूते में डाला, लेकिन मुझे वैसा महसूस नहीं हुआ, जैसा अक्सर होता था. बायें पांव के साथ भी यही असहजता हुयी. काफी जद्दोजहद की, लेकिन अब रेस शुरू होने में सिर्फ दो मिनट बाकी थे. मैंने देखा कि घबराहट में मैंने दाहिने पांव को बायें पैर के जूते में डाल दिया था. लेकिन गलती ठीक करने की गुंजाइश नहीं थी. मेरा नाम पुकारा गया. मुझे लगा कि स्टेडियम की छत शोर से गिरकर नीचे आ जायेगी. रेस शुरू हुयी. मुझे याद है कि पहले दो सेकंड तक मेरे पांव जैसे ट्रैक से चिपके रहे. तब तक मैं जिन्दा लाश की तरह था, लेकिन उसके बाद मेरे साथ क्या हुआ, मुझे नहीं मालूम. मैंने बेहद सहजता से अपनी रफ़्तार तेज की और आगे निकलता गया. कौन सी ताकत मुझे साहस दे रही थी, मुझे आज भी नहीं पता .

सिर पीछे रखकर और घुटने आगे कर दौड़ने का मेरा तरीका भद्दा था. लेकिन इस भद्दे और गैर-परंपरागत तरीके के साथ मैं फिनिशिंग लाइन पर पहुंचने वाला पहला खिलाड़ी था. मैं खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था कि मैं जीत गया हूं. स्टेडियम में लोग अपने होश खो बैठे थे. किसी ने मुझे जमैका का झंडा दिया तो मैं इसे अपने कंधे पर लगाकर घूमने लगा. इससे पहले मैंने अमेरिकी धावक माइकल जानसन को ऐसा करते हुये देखा था. फिर मैंने झुककर स्टेडियम में बैठे अपने चाहने वालों को कृतज्ञता में ‘सैल्यूट’ किया. मैंने देखा कि उनकी आंखों में मेरे लिये भरोसा था. मैं भविष्य में उन्हें ऐसे और भी मौके देने वाला था.

अनुवाद

अभिनव श्रीवास्तव 

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