अगस्त क्रांति के 75 वर्ष : समाजवादी आंदोलन के विशेष संदर्भ में

मणेन्द्र मिश्रा मशाल
नौ अगस्त 1942 की अगस्त क्रांति और भारत छोड़ो आंदोलन का स्वतंत्रता आन्दोलन में ऐतिहासिक महत्व था. यह दिन 1857 की क्रांति के बाद आजादी के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था. आठ अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासमिति ने बम्बई में करो या मरो का प्रस्ताव पारित किया था. नौ अगस्त को प्रतिबन्ध के बाद भी बम्बई में हजारों देशभक्तों ने राष्ट्र ध्वज फहराने का प्रयास किया जिसका अंग्रेजी हुकूमत ने क्रूरता से दमन किया. सोशलिस्ट नेत्री अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक अगस्त क्रांति मैदान में तिरंगा फहराया. इस आन्दोलन का संपूर्ण संचालन आचार्य नरेंद्र देव,जेपी,लोहिया,अच्युत पटवर्धन,युसूफ मेहरअली सहित महिलाओं ने प्रमुख रूप से किया. महिलाओं में अरुणा आसिफ अली, कमला देवी चट्टोपाध्याय, उषा मेहता, वनलता सेन,सुचेता कृपलानी,किरण चक्रवर्ती और माया घोष ने अंग्रेजी प्रतिरोध का डट कर मुकाबला किया और जेल भी गयीं.
डा.राम मनोहर लोहिया अगस्त क्रांति को बेहद महत्वपूर्ण मानते थे. उन्होंने 2 अगस्त 1967 को डॉ.जी जी पारीख को लिखे गये पत्र में कहा था कि “15 अगस्त राज्य दिवस है,9 अगस्त जनदिवस है. कोई दिन ज़रूर आएगा जब 9 अगस्त के सामने 15 अगस्त फीका पड़ेगा और हिन्दुस्तानी अमेरिका के 4 जुलाई और फ्रांस के 14 जुलाई जो वहां जन दिवस है उसी प्रकार 9 अगस्त को मनाएंगे.” लोहिया देश की स्वतंत्रता के बाद भी जनता के लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए गोवा मुक्ति, नेपाल के राणाशाही का खात्मा और तिब्बत पर चीनी कब्जे का विरोध जैसी वैश्विक महत्व वाली घटनाओं के सूत्रधार बने..
आज़ादी के समय 1946-47 में जिन समझौतों के जरिये भारत से अंग्रेजी राज समाप्त हुआ उनमें देश का बंटवारा सबसे दुखद निर्णय था. इस निर्णय से गांधी जी के साथ समाजवादी विचार परम्परा वाले लोग समान रूप से दुखी और असहमत हुए. 30 जनवरी 1948 को हिन्दू मुसलमान सहित भारत-पकिस्तान के बीच शांति-सौहार्द कायम रखने के प्रयास में बापू शहीद हो गये. बापू की हत्या से कांग्रेस में समाजवादियों के लिए कोई स्थान नही बचा. कांग्रेस समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से बाहर निकल कर लोकतान्त्रिक मूल्यों में आमजनमानस की हिस्सेदारी बनाने के लिए सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के माध्यम से पूरे देश में संगठन खड़ा करने का प्रयास किया. रजवाड़ों,जमीदारी प्रथा एवं अग्रेजी राज के समर्थकों की ताकत घटाने के आन्दोलन शुरू हुए.1952 के पहले आम चुनावों में सफलता मिलने के बाद भी समाजवादी नेतृत्व ने देश निर्माण की चुनौतियों का सामना करने में जनता की अगुवाई का काम किया. ‘वोट,फावड़ा व जेल’ की त्रिवेणी समाजवादियों की पहचान बनकर उभरी. इन रचनात्मक और लोकतांत्रिक बहस वाले कार्यक्रमों से सोशलिस्ट पार्टी कई राज्यों में प्रमुख विरोधी दल के रूप में पहचान बनाने में सफल हुयी. लेकिन विचार, कार्यक्रम और संगठन तीनों स्तरों पर गहरे विचार विमर्श के फलस्वरूप जबरदस्त बिखराव हुआ. अनेक प्रयोग असफल भी हुए. सही कार्यक्रम के अभाव और दिशा भ्रम की वजह से अनेक नेता वापस कांग्रेस में चले गये. इन्ही वजहों से 1956-57 में समाजवादी परिवार को चुनाव में गहरी निराशा मिली. जबकि संप्रदायवादियों और साम्यवादियों को सोशलिस्टों से ज्यादा सफलता मिली. लेकिन समय के साथ नई दिशा, नये कार्यक्रम और नये आन्दोलन के जरिये समाजवादी धारा में पुनः उत्साह का संचार हुआ.
इस कालखण्ड के बाद 1956- 57 से आगे का समय समाजवादी सर्जक डॉ. राममनोहर लोहिया की धारा का दौर माना गया. जिससे 1967 के चुनाव में देश के कई राज्यों और 1977 में केंद्र से कांग्रेस को सत्ताच्युत किया.लोहिया की भाषा नीति जिसमें अंग्रेजी भाषा हटाओं और देशी भाषा लाओ,जाति नीति (पिछड़ों यानी महिला दलित,आदिवासी,पिछड़े जातियों और अल्पसंख्यकों के पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर) और दाम नीति (खेती और कारखाने के उत्पादनों में दाम संतुलन,एक फसल से दूसरी फसल के बीच दाम संतुलन) जैसे तीन सूत्री समाजवादी राजनीति का दौर शुरू हुआ. इसी समय डॉ लोहिया के नेतृत्व में “एक पाँव रेल में- एक पाँव जेल में “ यानी लगातार दौरा और सत्याग्रह इनकी खूबी बनी. 1962 में इसी सतत संघर्ष से फूलपुर में डॉ. लोहिया की जवाहर लाल नेहरु के सामने हार के बाद फर्रुखाबाद के उपचुनाव में 1963 में जीत का रास्ता बना. लोकसभा में लोहिया के प्रवेश से वंचित वर्गों के हित और गरीबी का मुद्दा राजनीति के केंद्र में आ गया. कांग्रेस सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ. सड़क के सवाल संसद तक पहुँच गये.
1967 से 77 के बीच देश में राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ा जिसका परिणाम गुजरात और बिहार के छात्र-युवा और जनआंदोलनों में दिखा. यही वह दौर था जब सत्ता पर बने रहने के लिए लोकतंत्र को ही समाप्त करके पूरे देश को बंदीगृह बनाने का प्रयास हुआ. चुनाव पर रोक लगा दी गयी. अख़बारों पर पाबन्दी लगा दी गयी. जिसके परिणामस्वरूप जयप्रकाश ने इस परिस्थिति को ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ की संज्ञा दिया. लोकतंत्र पर छाए काले बादल को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी विचार परम्परा के लोगों ने मजबूती से आपातकाल का विरोध किया. तत्कालीन इंदिरा सरकार के अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों का सशक्त प्रतिरोध करते हुए देश भर में गिरफ्तारियां दी गयीं.जिसका असर 1977 के चुनाव में दमनकारी सरकार के सफाए से हुआ. उस समय जनमत से चुनी गयी जनता पार्टी की सरकार बहुमत में तो आ गयी लेकिन नेतृत्व को लेकर आम सहमति न बन पाने से सरकार पूरी तौर पर सफल नही हो सकी. सोशलिस्टों के आपसी खीचतान की वजह से जनता में स्वाभाविक निराशा उत्पन्न हुयी. जिसके बाद फिर से समाजवादियों के मूल एजेंडे गरीबी हटाओं को इंदिरा गांधी ने नारे में तब्दील करते हुए सफलता पायी. लेकिन कांग्रेसी नीतियों की असफलता और भ्रष्ट्राचार की वजह से जनता ने एक बार फिर समाजवादियों में विश्वास किया. 1989 में देश भर के समाजवादी जनता दल के बैनर तले चुनाव लड़कर फिर से सरकार में आये,लेकिन नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को लेकर मतभेद बरकरार रहा.1996 में संयुक्त मोर्चा गठबंधन के तहत जब समाजवादी साथियों ने जनता की बेहतरी के लिए केंद्र में सरकार का गठन किया वह भी अपना कार्यकाल पूरा नही कर सका. ऐसे में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अपनी क्षेत्रीय पहचान को बनाये रखने की जिद में समाजवादी आन्दोलन को देश में जो मुकाम मिलना चाहिए था, उसका अभाव अब भी बना हुआ है.
देश के विभिन्न प्रदेशों में समाजवादी विचारों वाली सरकारों की संख्या बढ़ी है. जिनका अंतिम लक्ष्य समृद्धि के साथ समानता लाना है. इस दिशा में देश के सबसे बड़े सूबे के मुखिया अखिलेश यादव सबसे आगे और बेहद गंभीर दिखाई देते हैं. समाजवादी आन्दोलन के अगुआ राम मनोहर लोहिया के दिए गए नारे ‘दवा पढ़ाई मुफ़्ती होगी-रोटी कपड़ा सस्ती होगी’ को सार्थकता पहुँचाने में अखिलेश सरकार का प्रयास सराहनीय है. समाजवादी पेंशन योजना के माध्यम से समाज के वंचित वर्ग को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना समाजवादी सोच ही है. लेकिन अभी भी कई मोर्चो पर सरकारी नीतियों में ईमानदार सोच के साथ जन सहभागिता को बढ़ाने में बड़ा प्रयास करना पड़ेगा. तभी असल समाजवाद का मंतव्य कारगर हो सकता है. लोहिया-जेपी के विचार दर्शन पर चलने वाले दलों के सामने चुनौती और संकट बढ़ी है.  एक ओर साम्प्रदायिकता की वजह से समाज में गंगा-जमुनी तहजीब में टूटन हो रही है वहीं जाति आधारित समाज में गैर बराबरी और आपसी समन्वय तेजी से बिगड़ रहा है. आवारा पूँजी का प्रभाव समाज के सभी क्षेत्रों पर पड़ रहा है. जो अपने साथ गंभीर विषमता और बुराईयाँ ला रहा है.
ऐसे में जब हम अगस्त क्रांति की 75वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं, तब जनता की आजादी के मायने पर खुलकर बात करनी होगी. सरकारी लूट के साथ कारपोरेटी लूट के गठजोड़ से जनता अपनी आजादी खोती जा रही है.बुनियादी जरूरतों के नाम पर बंदरबांट के बीच लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई तेज करने की जरुरत बढ़ गयी है. गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याओं की भयावहता चिंतनीय है. जनता में निराशा और हताशा का वातावरण बन रहा है. ऐसे किसी समाज की कल्पना आजादी की लड़ाई लड़ने वाले वीरों ने नही किया था. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गयी कुछ सरकारें बेहतर प्रयास कर रही हैं, लेकिन उनकी गति में पर्याप्त तेजी नही है. इसलिए 9 अगस्त के दिन देश की सभी निर्वाचित सरकारों विशेषकर समाजवादी विचार परंपरा की सरकारों को इस दिन के ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए जनता के प्रति और उदार भाव से बदहाली दूर करने की दिशा में और अधिक ठोस कार्य करने की शुरुआत करनी चाहिए. यही इस महान दिवस के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

मणेन्द्र मिश्रा मशाल

लेखक व समाजवादी चिंतक

संस्थापकसमाजवादी अध्ययन केंद्र, 

Email: mishra.marinder@gmail.com

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