आखिर इन भारत भाग्य विधाताओं को शर्म क्यों नहीं आती?

अभिनव श्रीवास्तव

चलिये, बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में हुयी ह्रदयविदारक घटना पर बात करने की शुरुआत उन टूटी फूटी वजहों से करें जो अब तक उत्तर प्रदेश सरकार गिना पायी है. वैसे तो उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार और शायद बहुत हद तक खुद केंद्र सरकार के लिये 36 मासूमों और 18 वयस्कों की मौत और उनके परिजनों की चीख पुकारें भी इतनी बड़ी घटना नहीं थी कि वे इस पर थोड़ी सी नैतिक शर्मिंदगी के साथ तुरंत कोई जिम्मेदारी लेती. अगर यह घटना इतनी भयावह नहीं होती तो शायद सरकार की मुतमइनी का ये आलम टूटता भी नहीं. अच्छा ये भी है कि इस मामले में उसके पास गाय, गोबर, राष्ट्र, झंडा जैसे जाने पहचाने नैरेटिव नहीं है. वर्ना लगभग साठ मौतों से उपजा दर्द और शोक भी इन शब्दों से पैदा हुये शोर में कहीं घुट जाता और सरकार पूरी निर्लज्जता और अकड़ के साथ अपने आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की बात कह रही होती.

फिर भी मामले के लगभग चौबीस घंटे बीत जाने के बाद सरकार ने अपनी एक कहानी तो गढ़ी है. उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह इस कहानी के पहले उद्दंड और बेशर्म पात्र हैं. वे बताते हैं कि ये मौतें इसीलिये सामान्य हैं क्योंकि अगस्त महीने में मौतें होती ही हैं. उन्हें इन मौतों के पीछे घोर  सरकारी लापरवाही, बेरुखी और संवेदनहीनता कोई वजह नहीं लगती, बल्कि वे लगभग इन मौतों को ‘प्राकृतिक’ जैसा बताते हैं. उनके इसी तर्क को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे बढ़ाते हैं और कहते हैं कि मीडिया तथ्यों की सही तस्वीर लोगों के सामने रखे. उनका मानना है कि ये मौतें आक्सीजन की आपूर्ति रुकने की वजह से नहीं, बल्कि अलग अलग वजहों से हुयी हैं.

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार का पूरा महकमा टुकड़े टुकड़े में जो ‘तथ्यात्मक श्रद्धांजलि’ काल कवलित मासूमों और लोगों को दे रहा है, उसकी प्रेरणा उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ही मिल रही है. नतीजतन, सरकार और प्रशासन यह साबित करने में जुटा है कि ये मौतें उस समय नहीं हुयीं, जब अस्पताल में आक्सीजन की आपूर्ति रुकी. वो अपनी सारी कुशलता मौत के आंकड़ों का ‘प्रबंधन’ करने में दिखाना चाहता है, जबकि घटना का पूरा विवरण उसकी गढ़ी हुयी कहानी के खिलाफ है. चूंकि उसके पास मशीनरी है, कुछ नौकरशाह हैं और सबसे बड़ी बात उसके पास आज के दौर का निर्लज्ज मीडिया है, इसलिये उसे विश्वास है कि देर सबेर इसकी मदद से वह पीड़ित परिजनों के दुःख और संवेदनाओं पर ठंडी राख फेंक ही देगा.

असल में, योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार के लिये ये मौतें सिर्फ एक कोरे आंकड़ें से कुछ ज्यादा होतीं, तो शायद उनसे संजीदा होने की आस भी रखी जाती. निस्संदेह, मौत के ये आंकड़ें हमारे सामने घटना का एक पहलू रखते हैं, लेकिन ये उस दर्द, दुःख, संवेदना और तकलीफ का हिसाब नहीं देते जो ताउम्र के लिये शोकाकुल पारिवारों के सीने में घर कर गयी है. ये उन गरीब मां बापों के उजड़े हुये सपनों को चंद गणितीय प्रतीकों में समेट देते हैं, जिनकी पूरी ज़िन्दगी अपने बच्चों को महज जिलाये रखने में खर्च होती है. इस कोशिश में भारत के गरीब कदम कदम पर सरकारी मशीनरी से दुत्कारे जाते हैं, फटकारे जाते हैं, लेकिन फिर भी ये आस नहीं छोड़ते कि सरकार कुछ नहीं तो कम से कम उनकी सांसों को चलाये रखने की जिम्मेदारी तो निभायेगी. जाहिर है कि इस घटना से वो न्यूनतम आस भी दरक गयी है, टूट गयी है.

लेकिन यही आज के राजनीतिक माहौल की सीमा है. इस न्यूनतम आस और उम्मीद के टूटने का जवाब मांगने पर तकरीबन गला पकड़कर आपसे ये सयाना सवाल पूछा जाता है कि मौतों का सिर्फ आंकड़ों में सिमटकर रह जाना, क्या केवल इसी दौर की परिघटना है? क्या ऐसा पहले किसी सरकार के राज में नहीं हुआ? मानो जैसे एक किस्म की घटना दूसरे किस्म की घटना को न्यायसंगत बना देगी, जैसे भोपाल गैस त्रासदी में उजड़े हुये घरों का दुःख गोरखपुर में टूट चुके मां बापों के दुःख को छोटा बना देगा. जाहिर है कि ऐसी तुलनायें न्यूनतम मानवीय संवेदनाओं को किनारे कर ही की जा सकती हैं. ये काम वो सरकारें और लोग करते हैं, जिन्हें जाति और धर्म जैसे संकीर्ण आधारों पर ‘मौत’ और ‘मौत’ में फर्क करना आता है, जिन्हें रह रहकर मौतों को हिन्दू या गैर हिन्दू में बांटकर राजनीतिक फायदा उठाने की लत लगी होती है.

निस्संदेह, इस मामले में भाजपा सरकार जरुरत से ज्यादा अहमन्य और नंगी साबित हुयी है तो इसीलिये क्योंकि वह राजनीतिक नैतिकता के तमाम मानकों को झुठलाकर ही सत्ता में आयी है. वह पहले देश को  सांप्रदायिक हिंसा की भट्टी में झोंकने वाले एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है, हर तिकड़म लगाकर उसके दाग धोती है और फिर उसे भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा नायक घोषित करने का प्रयत्न करती है. एक ऐसा नायक जिसके मुंह से नौनिहालों की मौत पर तो एक शब्द भी नहीं निकला, लेकिन गोरखपुर के इस अस्पताल से थोड़ी दूर पर ही जिसने कभी अपने सीने की नाप बताकर इन मौतों से बचाने का राजनीतिक आश्वासन दिया था. इस घटना पर इस स्वयंभू नायक का मौन बताता है कि उसका सीना कितना ही चौड़ा हो, लेकिन दिल बहुत छोटा है. वैसे भाजपा को इस बात पर भी गर्व हो सकता है कि उसकी राजनीति ने देश को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पदों तक पर ऐसे चेहरे दिये जो इन पदों पर बैठने से पहले ही अपनी नैतिक वैधता खो चुके थे.

वास्तव में ये एक प्रतीकात्मक यथार्थ है, जिसको हम हाल फिलहाल बने राजनीतिक माहौल में हर पल परख सकते हैं. आखिर रोहित वेमुला की राजनीतिक हत्या पर इस वैचारिकी द्वारा उसकी जातिगत पहचान को झुठलाने की बेशर्म कोशिशों और फिर उसके अपराधियों को पुरस्कृत करने की बात को कौन भूल सकता है? विमुद्रीकरण के समय की गयी वित्त मंत्री अरुण जेटली की उस निर्दयी टिप्पणी को कौन भूल सकता है जब उन्होंने नकदी दिक्कत के चलते देश की गरीब आबादी को अस्पताल में इलाज कराने के लिये क्रेडिट और डेबिट कार्ड बनाने की सलाह दे डाली थी, जिसका परोक्ष अर्थ यही था कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड ही उनके जिन्दा रहने की एक मात्र शर्त है.

दिन पर दिन गहरा रहे इस यथार्थ में ऐसी सरकार और प्रतिनिधियों से कोई उम्मीद भी क्यों की जानी चाहिये? लेकिन विडम्बना यही है कि हमें जवाब इसी सरकार और इन्हीं रूखे प्रतिनिधियों से मांगने हैं. हमारे लोकतंत्र के अध्याय में गोरखपुर में हुयी ये मौतें और मायूस परिवारों की तकलीफें और आंसू  राजनीतिक हत्याओं के रूप में दर्ज होंगे. हालांकि हमें नहीं पता कि इस अध्याय में हत्यारों के रूप में किनका नाम लिखा जायेगा?

अभिनव श्रीवास्तव 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here