बंटवारा और भारत-पाक की तड़पती आत्मा!

अफाक़ अहमद

बंटवारे की पीड़ा का एहसास कैसे हो सकता है हमें जब दोनों तरफ़ क़रीब दस लाख लोग मार दिए गए और कमोबेश डेढ़ करोड़ लोग पलायन कर गए! पर कोई बताता नहीं कि इन दंगाईयों का नाम क्या था? भारत-पाकिस्तान के बंटवारे  में लाखों लोग मारे गए, सैकड़ों औरतों का बलात्कार हुआ, दुकानें-घर लूटपाट कर जला दिए गए; पर क्या एक भी अपराधी की रिपोर्ट किसी थाने में दर्ज हुई? आख़िर जब आंकड़े आए कि पांच से दस लाख लोग मारे गये, डेढ़ करोड़ लोग दोनों मुल्कों की सरहदों को पार कर गए तो किसी क़ातिल का नाम सामने क्यों नहीं आ पाया?—ये तो यही हुआ कि आज गाय-बछड़े के नाम पर इंसान का वध कर दो और क़ातिल का नाम सामने आ ही ना पाए…क्यों?—क्योंकि क़त्ल तो भीड़ ने किया…भीड़ में किस चिन्हित दंगाई के कितने मज़बूत प्रहार-चोट से वो इंसान मरा इसका इविडेंस आप कहां से लाएंगे—आख़िर छूट जाएगा क़ातिल, सुबूतों और गवाहों के अभाव में! क्या यही है इंसाफ़ का तक़ाज़ा कि एक इंसान को सत्तर हूरों के पास भेज दो और इससे भगवान ख़ुश हो जाएगा क्या? इससे भगवान नहीं तुम्हारे अंदर का शैतान ख़ुश होता है!

भारत-पाकिस्तान का ख़ूनी बंटवारा हुआ और जहां सामूहिक बलात्कार के बाद एक तरफ़ मुस्लिम औरतों की छातियां काटकर बोरों में भरकर ट्रेनों से पाकिस्तान भिजवाई जाती रहीं और उधर से सिखों, हिंदुओं के सीने में ख़ंजर घोंपकर ट्रेनों की बोगियों को ख़ून से लथपथ कर दिया गया था!

जहां जिस भी हिन्दू-मुस्लिम को एक-दूसरे की लड़कियां-औरतें मिलीं उनका ज़िना कर मार डाला गया या ज़िंदा लाश बना दिया जाता रहा…यही नहीं अनगिनत हिंदू-मुस्लिम औरतों को बंधक-बंधुआ बनाकर या तो ग़ुलाम बना लिया गया, घर की दासी बना दिया गया या उनका धर्मांतरण कर उनसे जबरन शादी रचा ली गयी! भारत से भागकर जिसने भी पाकिस्तान की सरहद पार की वो मुहाजिर कहलाया और पाकिस्तान से भारत आने वालों के माथे पर पाकिस्तानी होने का कलंक ताउम्र लगा रहा!

सैंतालीस में पैदा हुआ बच्चा कोख से ही नफ़रत सीखता रहा और जिन अबोध बच्चों ने आज़ाद भारत-पाकिस्तान में मचे नरसंहार को देखा वो एक असीम पीड़ा को अपने दिलों में सहेजकर अपने-अपने वतन कूच कर गए थे. इस तरह एक ‘साझे सांस्कृतिक विरासत’ वाले मुल्क आज मज़हबी ऐतबार से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बनते चले गए हैं।

जिनके साथ 20-20, 25-25 सालों तक एक लड़का खेलता रहा, हंसी -ठिठोली करता रहा, खोमचे-जलेबी खाता रहा, मौज-मस्ती करता रहा, स्कूल जाता रहा, पढ़ता-लिखता रहा, क्रिकेट-फुटबॉल खेलता रहा, आपस में झगड़ता रहा, वही शख़्स जब यकबयक बिछड़ा होगा तो उसकी पीड़ा और टीस को हम अल्फ़ाज़ की चाशनी में कैसे डुबो सकते हैं?!

एक नई-नवेली ब्याहता जब अपने पति से बिछड़ी होगी, एक गुड़िया-सी बच्ची जब हिंदू-मुस्लिम की साझा-संस्कृति में पलती-बढ़ती रही, बचपन की मासूमियत से लेकर जवानी के अनाड़ीपन तक मस्ती करते हुए गुज़रा वक़्त तब शूल बनकर चुभा होगा जब उसे अपनी उन दोस्तों से बिछड़ना पड़ा होगा जो साथ-साथ खेलती रहीं, पढ़ती रहीं, माँ-बाप के डांट और दुलार में पोषित होती रहीं और अचानक ही इस ख़ूनी बंटवारे  ने उनका वो आशियाना उजाड़ डाला जो आज एक खण्डहर में तब्दील हो गया होगा, गोदाम बन गया होगा या जहां जानवर बाँधे जा रहे होंगे. कैसे कह दें कि ये कैसी पीड़ा है जो अनकहा-सा है—इसके दर्द को वही झेल सकता है जिसने इन ख़ूनी मंज़र को अपनी आँखों से देखा हो.पर ऐसे लोग अब ज़िंदा कम ही बचे होंगे!

और इसके बाद भी जब बंटवारे के अवशेषों के बीच अपनी जान बचाने के लिए उन्हें सालों संघर्ष करना पड़ा होगा! इस तरह कहा जा सकता है कि भारत-पाकिस्तान में विस्थापितों का भयंकर जमावड़ा इंसानी तारीख़ में सबसे बड़े पलायनों में से एक गिना जाता है। आज भी इतिहास की ये त्रासद घटना जिसमें लाख नहीं करोड़ लोग विस्थापित हुए हों—ये कैसी चाल और किसकी चाल थी जब सब-कुछ नीलाम होकर रह गया हो?! क्या कोई लौटा पाएगा उन गर्म रिश्तों को जो ज़ेहन से नहीं दिल से जन्म लेते रहे होंगे जब भारत आज़ाद नहीं था और पाकिस्तान बना नहीं था…कई राज़ों का पर्दाफ़ाश हो सकता है अगर उस वक़्त का कोई फक्कड़ इंसान डायरी लिखने का शौक़ीन रहा हो, उसने अपनी डायरी में लुक-छिपकर ही सही पर सच बात लिखी हो और आज वो ज़िंदा हो—ये एक यक्ष प्रश्न ही है कि क्या ऐसा है और वो शख़्स ज़िंदा है?!

आज़ादी से पहले की ‘महिंद्रा & मोहम्मद’ आज ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ है। 15 अरब डॉलर की कंपनी आज दुनिया की सबसे बड़ी ट्रैक्टर निर्माता कंपनी है; बस फ़र्क़ यही है कि तब की ‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ आज की ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ है.सब-कुछ साझा था हमारा—ब्रितानी भारत का इतिहास, रहन-सहन, खानपान, बोली-भाषा, रोज़ी-रोटी, धंधा-पानी.अब अगर कुछ साझा नहीं है तो वो है राजनीतिक कड़वाहट और आपसी अविश्वास! आख़िर ऐसा क्या था कि सब-कुछ साझा होते हुए भी हम बंट गए?!

दरअसल उस वक़्त मुसलमानों के अंदर ये बात घर कर गयी थी कि वो आज़ाद भारत में हिंदुओं के बहुसंख्यक होने से नुक़सान में रहेंगे और उन्हें अपने मज़हब के लोगों का हित साधने में दिक़्क़त आएगी! लेकिन आज भी भारत-पाकिस्तान के मुसलमानों की चिंताओं का समाधान हो पाया है क्या?! फिर बंटवारे  का मक़सद कहाँ पूरा हो पाया.

मेरा ये ज़ाती तौर पर मानना है कि अगर देश की आज़ादी बंटवारे  के बिना होती तो भारत-पाकिस्तान दोनों ही जगहों पर हिंदू-मुस्लिम-सिख और दूसरे मज़हब के लोगों की ज़िंदगी ख़ुशहाल रहती और सत्ता में भी कमोबेश बराबरी की हिस्सेदारी होती…तब शायद ना कहीं दंगे होते ना फ़साद और सत्ता का हस्तांतरण भी हिंदू-मुस्लिम के बीच रस्साकशी के आलम में तय पाता—तब एक सेक्युलर आईन की रौशनी में एक मज़बूत जम्हूरियत का निज़ाम क़ायम होता और ‘अखंड भारत’ का परचम पूरी दुनिया में लहराता!

बंटवारे ने लाखों नागरिकों को अपने ही मुल्क में बेगाना बना दिया था.उन्हें अपना पुश्तैनी घर-बार छोड़कर अपने ही मुल्क से एक नए निर्मित मुल्क में जाना पड़ा था। इंसानों की इतनी बड़ी अदला-बदली इतिहास में कम ही देखने को मिली है।

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक हिंसा के जो बीज अंग्रेज़ रोपकर गये थे वो आज तक मौजूद है! इस मज़हबी फ़साद का सबसे ज़्यादा असर पंजाब सूबे पर पड़ा। यहां एक तवील अरसे से हिंदू-मुस्लिम-सिख आपसी भाईचारगी से रहते आए थे—उनकी बोली, ज़ुबान एक थी और उनकी कल्चरल डाइमेंशन्स भी साझा थी; पर देश के बंटवारे के बाद ये एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए। ईस्ट पंजाब में रहने वाले मुसलमान वेस्ट पंजाब यानि पाकिस्तान भाग रहे थे और वेस्ट पंजाब में रहने वाले हिंदू और सिख ईस्ट पंजाब यानि भारत आने को मजबूर हुए थे।

देश के बंटवारे के वक़्त हुई इस हिंसा को गृह युद्ध भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि दोनों ही तरफ़ सेना ने नाकेबंदी नहीं की थी…हालाँकि ये अपने-आप भड़क उठने वाला फ़साद भी नहीं था। सभी मज़हब और संप्रदाय के लोगों ने अपने-अपने हथियारबंद गिरोह और सेनाएं बना ली थीं और इनका एक ही लक्ष्य था यत्र-तत्र-सर्वत्र दूसरे मज़हब के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को मारना और उनकी संपत्तियों-घरों को निशाना बनाना, नुक़सान पहुंचाना।

ये भी हैरतअंगेज़ है कि बंटवारे  के दौरान हिंसा के दोषियों की शिनाख़्त ही नहीं हो पाई। इसकी वजह ये हो सकती है कि आनन-फ़ानन में मिली आज़ादी के दौरान क़ानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं रह गयी थी, थानों की पुलिस मूकदर्शक हो सब देख रही थी और अंग्रेज़ इस मुल्क से बस अपना पिण्ड छुड़ा भागने की मुद्रा में आ चुके थे—उस वक़्त भारत में फंसे अपने ब्रितानी नागरिकों की जान बचाना अंग्रेज़ों की पहली प्राथमिकता थी और वो किसी पड़ी लकड़ी को हाथ नहीं लगाना चाह रहे थे वरना उस दौरान अंग्रेज़ों की मुदाख़लत से हिंसा पर अंकुश लगाया जा सकता था क्योंकि ब्रितानी हुकूमत की जो पुलिस स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बड़े आंदोलनों का दमन करती आई हो वो क्या ये दंगे रोक नहीं सकती थी?!

बंटवारे  के साथ भड़की इस हिंसा को रोकने के लिए कोई आगे नहीं आया था। ये किसी भी मुल्क के इतिहास की पहली घटना हो सकती है जहां कमोबेश दस लाख लोगों की मौत के ज़िम्मेदार क़ातिलों की शिनाख़्त ही नहीं हो पाई, इन्हें सज़ा देने की बात तो दूर की कौड़ी है। इस तरह बंटवारे  की वजह से जो भी हुआ उस पर भारत-पाकिस्तान दोनों ही मुल्कों ने चुप्पी साध ली थी। बाद के दिनों में सिनेमा, नाटक, थिएटर और साहित्य के ज़रिए बंटवारे  के भयानक क़िस्सों को कहा गया; इतिहासकारों ने भी चिकनी-चुपड़ी बातों और देश के विभाजन की राजनीति पर ही अपना तवज्जो मरकूज़ रखा और उन्होंने इंसानों के ख़ून से रंगे तारीख़ के इन काले और ख़ूनी पन्नों को मानवता के नज़रिए से जगह नहीं दी, इन्हें सिर्फ़ बंटवारे की राजनीतिक पहलुओं से ही मतलब रहा!

काश! ख़ूनी बंटवारे  की ये सुई पलट जाए और अंग्रेज़ों से संघर्ष करते हुए हम उसी ‘अखण्ड भारत’ को बिना किसी विभाजन के आज़ाद करा ले जाएं!

…और ये भी सच है कि ये कपोल कल्पना घड़ी की सुई पलटकर कभी सच नहीं हो सकती अब!!

अफाक़ अहमद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में  शोधार्थी हैं.

 यह लेख उनके फेसबुक वाल से साभार लिया गया है.  

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