कितनी खुशरंग रही ये सुबह ए आजादी !

अभिनव श्रीवास्तव

हिन्दुस्तान की ये सुबह ए आजादी कोई बहुत खुशनुमा नहीं थी. वैसे पंद्रह अगस्त की तारीख अपने आप में हमें आजादी से ज्यादा उन अंर्तविरोधों का एहसास कराती है, जिसके बारे में कभी बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर ने आगाह किया था. आप ये भी कह सकते हैं कि ये अंर्तविरोध तो भारत के लोकतांत्रिक प्रयोग की नियति की तरह थे. निस्संदेह, महज इन अंर्तविरोधों की वजह से आजादी की सुबह उदासी से नहीं भर जाती, उसका महत्व कम नहीं हो जाता. लेकिन तब क्या, जब कोई लोकतंत्र और सरकार नैतिकता और संवेदना जैसे उन बुनियादी मूल्यों की परवाह करना बंद कर दे, जिनसे सही मायनों में कोई लोकतंत्र जिन्दा रहता है या कम से कम सांस लेता हुआ तो दिखायी पड़ता है. कहने की जरुरत नहीं कि इन मायनों में हमारी आजादी की सत्तरहवीं सालगिरह बहुत फीकी, उदास और बदरंग थी.

जाहिर है कि लाल किले से बोलते हुये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास ये मौका था कि वो इस टीस को कुछ कम करते. वे देश को बताते कि गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में हुयी मासूमों की मौत की खबर उनके कानों तक भी पहुंची है, उन्हें भी दर्द हुआ है और वे कुछ नहीं तो कम से कम इस घटना में अपने नौनिहालों को खोने वाले मां बापों के गम में शरीक हैं. आखिर देश का प्रधानमंत्री रहते हुये वे कई बार ‘रोये’ हैं. मंच पर रोने के मामले में तो उनका रिकार्ड वास्तव में भारत के किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री से बेहतर है. फिर, इसके अलावा भारतीय मीडिया तो उन्हें ‘स्टेट्समैन’ मानता है. एक ऐसा विश्व नेता जो पड़ोस से लेकर पश्चिमी दुनिया में होने वाले हादसों पर दुःख जताता है, रोता है और बार बार उनसे निपटने का संकल्प लेता है.

लेकिन अपने संबोधन के शुरुआती हिस्से में ही उन्होंने इसे ‘अस्पताल में मासूमों की होने वाली मौतें’ कहकर इस ह्रदयविदारक घटना की तमाम राजनीतिक और प्रशासनिक वजहों को धुंधला कर दिया. फिर इन मौतों को प्राकृतिक आपदा के चलते होने वाली मौतों से जोड़कर ये बताया कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह की तरह ही उन्हें भी ये मौतें सामान्य और स्वभाविक लगीं. वास्तव में प्रधानमंत्री जन सामान्य की संवेदनाओं के साथ होने की बात बार बार दोहरा जरूर रहे थे, लेकिन संवेदनाओं की जमीन से बहुत दूर होकर. वर्ना, उन्हें जरूर मालूम होता है कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने घटना के बाद मासूमों के शव को एम्बुलेंस के बजाय टेम्पो से ले जाने का घोर अमानवीय आदेश तक दिया.

आखिर, क्या ये बात इतनी बड़ी है कि हमारी आजादी और लोकतंत्र के शाश्वत मूल्यों को ही झुठला दे? क्या सिर्फ एक घटना के आधार पर ऐसा कहना अपने ही लोकतंत्र की विरासत और बुनियाद पर शक करना नहीं है? प्रधानमंत्री के कुछ खास चाहने वालों से पूछें तो वे बिलकुल जैसे इसी भाषा में जवाब देंगे. वे ही क्यों स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि भारत में ‘सच्चा’ लोकतंत्र तो केवल वही लेकर आये हैं. इसके लिये वे आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास को खोखला और कुलीन मूल्यों से ग्रस्त बतायेंगे, अपनी सरकार के खुशनुमा आंकड़े और योजनायें पेश करेंगे और अंततः खुद को एक किस्म की  पुनुरुत्थानवादी राजनीति का नायक साबित करेंगे.

ऐसा कहते या करते हुये वे इस बात को याद नहीं रखते कि लोकतंत्र और कोई देश किसी ख़ास व्यक्ति या पार्टी की थाती नहीं होता. बल्कि अगर ऐसा हो तो लोकतंत्र होने का कोई मतलब भी नहीं रह जाता.

दरअसल, हमारे इस सत्तर बरस के लोकतंत्र में रोजमर्रा की राजनीति का भी एक नैतिक आधार था. आजादी के आंदोलन के वक्त इसे तैयार करने का काम स्वयं महात्मा गांधी और भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं ने किया. आजादी के बाद इस आधार को सींचने की जिम्मेदारी नेहरू ने उठायी. उन्होंने तो इसे नितांत निजी किस्म की नैतिकता से आगे जाकर किसी शाश्वत मूल्य की तरह स्थापित किया. नतीजतन, भारत घरेलू राजनीति से लेकर विश्व राजनीति में मानवीय और जनपक्षधर मूल्यों के साथ खड़ा हो पाया. निस्संदेह, उस दौर में भी कुछ घटनायें इसकी अपवाद रहीं. खुद नेहरू के बाद ही कांग्रेस ने इन मूल्यों की कोई बहुत अधिक परवाह नहीं की.

लेकिन अपनी आजादी के सत्तर बरस के बाद का ‘न्यू इंडिया’ तो जैसे इन मूल्यों से एकदम मुंह फेरकर खड़ा है. ज्यादा दुःख की बात तो ये है कि आज पूरी राजनीति में शोर गरीबों और समाज के सबसे निचले तबके के उत्थान का है, लेकिन असल में इसी तबके को भीतर ही भीतर बहुत निर्मम ढंग से खोखला बनाया जा रहा है और आखिर में उसे इस एहसास से भी महरूम रखा जाता है.

नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीति पूंजीवाद के इसी दौर की प्रतीक है, जहां वर्तमान की कीमत पर भविष्य को सुरक्षित रखने की चाह को सनकपन की हद तक पहुंचा दिया गया है, जहां रोज दर रोज बढ़ रही बेरोजगारी, महंगाई, हिंसा और मौतों पर किसी प्रधानमंत्री के मौन को ही उसकी मजबूती की तरह पेश किया जाता है. जहां आंकड़ों के उम्दा प्रबन्धन से किसी स्याह तस्वीर को बिलकुल उजला साबित किया जा सकता है और फिर जहां गोरखपुर में हुयी मासूमों की मौतों को प्राकृतिक आपदा जैसा बताया जा सकता है.आजादी की ऐसी सुबह का तो इन्तजार तो हमें सचमुच न था.

अभिनव श्रीवास्तव  

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