मासूम बच्चों की मौत पर भारी है अज्ञात बीमारी का रहस्य !

अविनाश उज्जवल

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का कोठिया गांव 1995 में पहली बार सुर्खियों में आया था. कांटी प्रखंड के इसी गांव में पहली बार अज्ञात बीमारी से 10 मासूम बच्चों की मौत हो गयी थी. 1995 से शुरू हुआ होने वाली मौतों का क्रम अब भी नहीं रूका है. हजारों मासूमों की जिंदगी को लीलने वाले इस महामारी का सरकार अब तक कोई ईलाज नहीं ढूंढ पाई है.

एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम ने पिछले 10 सालों में बिहार में लगभग 1600 बच्चोें की जिंदगी लील ली है. 5000 बच्चे इस रहस्यमय बीमारी से प्रभावित हुए हैं, 3000 विकलांग चुके हैं, वहीं पूरे भारत के परिप्रेक्ष्य में ऐसे बच्चों की संख्या 50 हजार से अधिक है और इन सब का कारण अब भी अज्ञात है.

जापानी इन्सेफेलाइटिस से 1978 से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं. सबसे पहले यह बीमारी 1978 में गोरखपुर में तब पता चली जब यहां के बीआरडी मेडिकल कालेज में 274 बच्चे भर्ती हुए जिनमें से 58 की मौत हो गई. तबसे आज तक सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर में इन्सेफेलाइटिस के करीब 39 हजार से अधिक मरीज भर्ती हुए जिसमें से नौ हजार से अधिक की मौत हो चुकी है. अब तो इसे सिर्फ पूर्वांचल की बीमारी कहना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है. सर्वाधिक प्रभावित होने वाले राज्यों में असम, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, यूपी और पश्चिम बंगाल है.

इस महामारी की विशिष्टता यह है कि यह 3-4 सप्ताह के लिए ही रहता है. बारिश शुरू होते ही इसका प्रकोप कम हो जाता है. एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम दो दशक से मुजफ्फरपुर व आसपास के जिलों सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुर, वैशाली, आदि में कहर बरपा रहा है. मई-जून में फन उठाने वाली यह बीमारी मुजफ्फरपुर में महामारी की तरह आती है. मानसून से पहले इस बीमारी का प्रकोप मुजफ्फरपुर के इलाकों में होता है जो बारिश की शुरूआत के साथ धीमा होता चला जाता है, वहीं गया और मगध के इलाकों में यह बीमारी मानसून के बाद पांव पसारती है. करीब 20 साल में हजारों मांओं की गोद सूनी करने वाले इस बीमारी के कारणों की खोज में दर्जनों डाक्टर, विशेषज्ञ लगे हैं, लेकिन अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाये हैं.

एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों में से 55 से 60 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु हो जाती है जो की चिंतनीय विषय है. हमें सोचना होगा कि इसके क्या कारण हैं. बच्चों की मौत हमारे लिए अपूरणीय क्षति है. हमारी पहली प्राथमिकता अपने बच्चों को इस महामारी से बचाने की होनी चाहिए.

यूनिसेफ बिहार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डाॅ सैयद हूबे अली कहते हैं कि बिहार में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के प्रभाव देखें तो पिछले साल पाए गए केसों में पहली बार चांदीपुरा वायरस के केस पाए गए हैं. भारत में सबसे पहले 1965 में महाराष्ट्र में इस वायरस को पाया गया था. इस के प्रभाव से बच्चों के सेंस में कमी आती है. बिहार में पिछले साल के एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के मामलों का विश्लेषण के दौरान यह पाया गया कि एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से होने वाले मौतों में 62 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जिन्हें सीधे घर से ही अस्पताल लाया गया था, इसके साथ ही अगर एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से होने वाले बच्चों की मृत्यु की उम्र को देखते हैं तो पाते हैं कि लगभग 43 फीसदी बच्चे 1 से 3 साल की उम्र के हैं. ऐसे में 1 से 3 साल के उम्र के बच्चों वाले मामलों को ज्यादा संवेदनशीलता के साथ लेने की जरूरत है. इसके इलाज और प्रबंधन हेतु एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के केसों में शुरूआती ईलाज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है. बिहार में इस बीमारी के प्रबंधन के लिए यूनिसेफ ने (Revised Standard Operating Procedures) तैयार किया जिसके माध्यम से हर साल फैलने वाली इस महामारी से बचाव और प्रबंधन की तैयारी की जा सके.

बिहार के प्रभावित क्षेत्र

क्या करने की है आवश्यकता !
एनएमसीएच, पटना की एसोसिएट प्रोफेसर और शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ अलका सिंह कहती हैं पिछले वर्षों केे अनुभव से पता चलता है कि एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम केे लक्षण शाम को करीब 8 से 9 बजे से शुरू होते हैं, आधी रात के दौरान आक्षेप (convulsion) होता है और बच्चे की स्थिति अगले 3-4 घंटों के भीतर तेजी से बिगड़ जाती है. convulsion के 4-5 घंटों के अंदर अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति की शुरूआत हो जाता है. अगर पीड़ित बच्चों को कोई चिकित्सीय सुविधा तुरंत नहीं मिलती हैं तो उनका जीवन बचाना काफी कठिन हो जाता है. लोगों के बीच एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के लक्षणों के बारे में जागरूकता जरूरी है साथ ही इन मामलों से निपटने के लिए उप केंद्र, एपीएचसी, पीएचसी, एसडीएच, जिला अस्पताल और मेडिकल काॅलेजों सहित स्वास्थ्य सुविधाओं को और सुदृृढ करने की आवश्यकता है. 06 माह से 10 वर्ष तक के बच्चों को प्रभावित करने वाली एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के प्रसार के लिए तेज गर्मी और उमस अनुकूल परिस्थिति है. लोगों को जागरूक करने और एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के लक्षणों की पहचान करने में किसी चिकित्सा विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह कार्य आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी बखूबी कर सकती है. इसके किए उनकी प्रतिबद्धता, जानकारी और कौशल को बढ़ा कर एक योजनाबद्ध प्रयास की आवश्यककता है. अगर आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर घर जाकर संदेहास्पद केसों को खोजें, जांच करें और तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर रेफर करें तो हम इस बीमारी की तीव्रता को कम कर सकते हैं और इससे मृत्यु दर भी कम होगा. इस बीमारी का बेहतर तरीके से प्रबंधन करके ही इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है.

स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने की हैं जरूरत !

प्रति पांच हजार की आबादी पर एक स्वास्थ्य उप केंद्र की आवश्यकता है वर्तमान में 9696 स्वास्थ्य उप केंद्र हैं. मानकों के अनुसार राज्य में 22 हजार स्वास्थ्य उप केंद्रों की आवश्यकता है. इसी तरह से 30 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की आवश्यकता है जबकि राज्य में 533 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और मानकों के अनुसार 3666 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की आवश्यकता है. इसी तरह से प्रति 20 लाख की आबादी पर एक मेडिकल काॅलेज अस्पताल की आवश्यकता है. राज्य में वर्तमान में सरकारी क्षेत्र में नौ मेडिकल और निजी क्षेत्र में तीन मेडिकल काॅलेज अस्पताल हैं. मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के मानकों का पालन किया जाये तो प्रति 1681 व्यक्ति पर एक चिकित्सक की आवश्यकता होती है. इस मानक के अनुसार राज्य की करीब 11 करोड़ की आबादी के मानक के अनुसार 65 हजार 437 डाॅक्टरों की आवश्यकता है.
यह पाया गया है कि बिहार के कोसी के क्षेत्रों में मानसून के पहले एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम चरम पर होता है वहीं मगध प्रमंडल के जिलों में इसकी भयावहता मानसून के बाद बढ़ती है. मगध प्रमंडल में पूर्वानुमान के अनुसार जुलाई के तीसरे सप्ताह में इसका प्रभाव चरम पर होता है.

जल्दी केस डिटेक्ट करना आवश्यकता
एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से पीड़त बच्चों की मृत्यु आठ से दस घंटो के अंदर ही हो जाती है ऐसे में इसको नियंत्रित करने का सबसे बेहतर माध्यम बचाव है. आमतौर पर इस बीमारी से लगभग 20 से 10 प्रतिशत बच्चों की जहां मृत्यु हो जाती है वहीं लगभग 50 से 60 फीसदी बच्चें मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग हो जाते है. एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के बारे में गांव- गांव में जागरूकता फैलाए बिना, हम इस महामारी को रोक नहीं सकते. एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से होने वाली मौतों को कम करने के लिए हमें शुरूआती स्टेज में ही प्रभावित बच्चों को इलाज मुहैया करवाना होगा और इसके लिए हमें केसों को जल्द से जल्द डिटेक्ट करना होगा. आशा और आंगनबाड़ी के द्वारा घर घर जाकर संदेहास्पद केसों को देखने से इस साल बिहार में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम के मामलों मे कमी आई है.

बच्चों को रात का भोजन अवश्य करवाएं
2017 में विश्व प्रसिद्ध स्वास्थ्य जर्नल लैनसेंट के द्वारा मुज्जफरपुर में भर्ती हुए बच्चों पर एक अध्ययन किया गया था . इसकेे अनुसार इस बीमारी के लक्षण वाले मामलों में 62 प्रतिशत बच्चों का शुगर लेवल 70 एमजी से कम था. इस अध्ययन से पता चलता है कि मुजफ्फरपुर में तीव्र एन्सेफैलोपैथी का प्रकोप, दोनों हाइपोग्लाइसीन ए और एमसीपीजी की विषाक्तता से जुड़ा है. बीमारी को रोकने और इस क्षेत्र में मृत्यु दर को कम करने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चे शाम का भोजन अवश्य करके सोएं.

एंबुलेंस और मोबाइल यूनिट की तैनाती
संदेहास्पद केसों में तुंरत चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाने के लिए ज्यादा प्रभावित ईलाकों में मोबाइल मेडिकल वैन की तैनाती, निजी वाहन से आने पर अस्पताल के स्तर से उसके भुगतान की सुविधा जैसे प्रयास भी मददगार साबित होंगे.

बिहार के जीडीपी और विकास दर पर नजर डालें तो यह पूरे देश में सबसे ज्यादा हैं पर अगर स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण और बाल विकास जैसे मुद्दों पर नजर डाले तो बहुत सारे मानको पर बिहार सबसे नीचले पायदान पर है. हाल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 7 निश्चयों की घोषणा की है. लेकिन स्वास्थ्य की बेहतरी से जुड़े मुद्दे इससे गायब हैं. 2015 में पहली बार श्री जीतन राम मांझी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मुज्फ्फरपुर का दौरा किया था. सरकार की असंवेदनशीलता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है बिहार के मुख्यमंत्री को एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम पीड़ित बच्चों को देखने में 20 साल लग गए. कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि इससे ज्यादातर पीड़ित बच्चे दलित और महादलित समुदायों से आते हैं!

अविनाश उज्जवल

State Media Consultant, UNICEF ( Bihar)

 

 

 

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