क्या समझौता एक्सप्रेस मामले की जांच को पलट रही है मोदी सरकार?

पंकज चतुर्वेदी 

मामले की जांच में शामिल उस समय हरियाणा पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक विकास नारायण रॉय ने यह जानकारी एक साल पहले एक दैनिक अखबार से साझा की थी.

पानीपत के नजदीक 18 फरवरी 2007 में पाकिस्तान जा रही समझौता एक्सप्रेस को निशाना बनाकर हुए आतंकी हमले में दो डिब्बे पूरी तरह जल गए थे. धमाके में 68 लोग मारे गए थे. मरने वालों में दोनों देशों के नागरिक शामिल थे. कुछ ही दिनों में पाकिस्तान के विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी द्विपक्षीय वार्ता के लिए दिल्ली आने वाले थे.

ऐसे में धमाके का स्वाभाविक संदेह सबसे पहले जिहादी, आतंकी गिरोहों पर गया जो वार्ता को पटरी से उतारना चाहता रहा हो. पाकिस्तान की कुख्यात आईएसआई की अपनी सरकार से स्वतंत्र दखलंदाजी, लश्कर ए तैयबा जैसे संसाधन वाले आतंकी संगठन की भारत में घुसपैठ और बदनाम सिमी की देश में व्यापक गतिविधियों के दौर के चलते, शक की सुई उनकी ओर ही घूमनी थी.

लेकिन जांचकर्ताओं के लिए यह अविश्वसनीय जैसा रहा जब जांच में इस आतंकी हमले के तार असीमानंद के नेतृत्व में कर्नल पुरोहित समेत प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसे साजिशकर्ताओं से जुड़ते चले गए. लेकिन वारदात के नौ सालों बाद एनआइए प्रमुख शरद कुमार को लगने लगा है कि एनआइए और दूसरी एजेंसियों ने समझौता बम धमाके मामले में जिन अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है, वह असल अभियुक्त हैं ही नहीं, असल गुनहगार तो लश्कर-ए-तैयबा वाले हैं, जिनको अबतक गिरफ्तार ही नहीं किया जा सका है. एसआइटी ने 2007 और 2008 तक स्वतंत्र रूप से सक्रिय अनुसंधान कार्य किया. इसके बाद, इस जघन्य अपराध के अंतर्राज्यीय विस्तार के चलते, सीबीआई ने अन्य आतंकी मामलों के साथ इसकी भी मॉनिटरिंग शुरू की. जुलाई 2010 में यह केस आतंकी मामलों की जांच के लिए बनी विशेष केन्द्रीय एजेंसी एनआइए को सुपुर्द हो गया.

अहम सबूत की भूमिका निभाई अटैची ने

दिल्ली स्टेशन पर, जहां से ट्रेन चली, सीसीटीवी कैमरे जाने कब से खराब पड़े थे जो हमारे किसी काम नहीं आए. लेकिन घटना स्थल से मिले दो साबुत अटैची बम डिवाइस, जो टाइम मिसमैच के कारण फटे नहीं, अनुसंधानकर्ताओं को इंदौर और धमाके के आरोपियों तक पहुंचाने में सहायक बने. ये मुख्यतः आग लागने वाले उपकरण थे न कि विस्फोटक आरडीएक्स वाले जैसे उन दिनों आतंकी वारदातों में आमतौर पर प्रयुक्त होते थे. इसकेे इस्तेमाल के पीछे सोच रही होगी कि भागती ट्रेन में आग ज्यादा कहर ढायेगी न कि विस्फोटक.

एनआइए ऐसे छोड़ रही समझौता अभियुक्तों को

अब समझौता धमाके के अभियुक्त और मास्टर माइंड असीमानंद को बचाने को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दबाव केन्द्र सरकार और जांच एजेंसी पर साफ नजर आता है. गवाहों को अदालत में पलटाया जा रहा है, अभियोजकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि अभियोजन को कमजोर करें और सबसे बढ़कर स्वयं एनआइए की मिलीभगत से अदालत को भ्रमित करने वाले तथाकथित ‘दस्तावेज’ आतंकियों के बचाव में उद्धृत किए जाने लगे हैं. यूएन और अमेरिका के सन्दर्भ से ऐसे-ऐसे कागजों का हवाला दिया जा रहा है जो असीमानंद गिरोह की संलिप्तता को ख़ारिज करते हैं. यह सब सरकार और एनआइए स्तर की मिलीभगत के बिना संभव नहीं.

असीमानंद या अन्य को ऐसे ही नहीं पकड़ा गया

धमाके के बाद हरियाणा एसआइटी ने आतंकियों के इंदौर संबंध को उजागर किया. एसआइटी ने परंपरा मुताबिक आनन-फानन में वाहवाही लूटने के चक्कर में जेलों में बंद सिमी से जुड़़े कैडर को नहीं उठाया. उसी वर्ष हैदराबाद के मक्का मस्जिद विस्फोट के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस ने अंधाधुंध मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी कर अपनी जम कर किरकिरी करा चुकी थी. समझौता मामले में धैर्य पूर्ण जांच का परिणाम रहा कि पहली बार शक की सुई हिन्दू संगठनों की ओर घूमी और अंततः यह प्रक्रिया असीमानंद के नेतृत्व के पर्दाफाश तक पहुंची. इस नेटवर्क को ब्रेक करने का काम 2007 से 2012 के बीच हरियाणा एसआइटी, महाराष्ट्र एटीएस, सीबीआई और एनआइए ने किया.

और साजिशकर्ता आरएसएस से जुड़े थे

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पृष्ठभूमि के सुनील जोशी की दिसम्बर 2007 में उसके दो साथियों कुलसान्ग्रे और डांगे ने हत्या कर दी और तब ये तीनों नाम समझौता काण्ड में प्रमुखता से आने लगे. बिजली के जानकार कुलसान्ग्रे और डांगे दोनों की बम बनाने में प्रमुख भूमिका थी और वे आज तक भी फरार चल रहे हैं.

2008 में महाराष्ट्र एटीएस ने मालेगांव बम काण्ड में प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटर साइकिल बरामद की और तब इस गिरोह के तमाम अन्य नाम भी सामने आए. इनमें असीमानंद और कर्नल पुरोहित प्रमुख मास्टर माइंड थे. पता चला कि कमल चौहान, अमित चौहान, लोकेश शर्मा और राजेन्द्र पहलवान ने समझौता ट्रेन पर चार बम रखे थे. महाराष्ट्र एटीएस के मुखिया हेमंत करकरे उसी वर्ष नवम्बर में मुम्बई आतंकी हमलों में आतंकियों के हाथों शहीद हो गए थे. उनकी शहादत से करीब दस दिन पूर्व मेरी उनसे विस्तार से बात हुई थी और उन्होंने भी असीमानंद के नेतृत्व में इस गिरोह की भूमिका की पुष्टि की थी.

आमने-सामने
2007 समझौता बम धमाके में शामिल आतंकियों को लेकर अबतक चली जांच को एनआइए पलटने में लगा है. एनआइए ने धमाके में लश्कर-ए-तैयबा का हाथ होने की आशंका जताई है और यूपीए के समय हुई गिरफ्तारी पर प्रश्न खड़ा किया है.

यह आलेख पंकज चतुर्वेदी की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है.

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